_शायद--- डायरी के सुस्ताते पन्नों से ........
कभी कभी ज़िन्दगी निभाने के लिये ज़िन्दगी कम पड़ने लगती है और समय रेत की तरह हाथ से फिसल जाता है ,
और हम आधे अधुरे से दुनियाँ से चले जाते है और अपने पीछे छोड़ जाते है "शायद"
सच ये "शायद" भी बड़ी अजीब चीज होती है कभी हँसाती है तो कभी रुलाती है।
क्योंकि "शायद" को लेकर इंसान अपने में नहीं रहता। इसी बात को खुद से जोड़कर कि यदि ऐसा होता तो "शायद" यदि वैसा होता । अपनी पूरी ज़िन्दगी बिताता है, उसके दिमाग पर "शायद" की परत चढ़ जाती है और वो कुछ भी निश्चित करने में सक्षम नहीं हो पाता ।
हर घटना "शायद" की भेंट चढ़ी होती है। हर परिवर्तन को "शायद" से जोड़ दिया जाता है।
यहाँ तक परम सत्य मृत्यु भी "शायद" की एक गाँठ अपने पीछे छोड़ जाती है।
फिरभी यही वो "शायद" होता है जो जीने की वजह भी देता है...... एक उम्मीद देता है..........
और हम आधे अधुरे से दुनियाँ से चले जाते है और अपने पीछे छोड़ जाते है "शायद"
सच ये "शायद" भी बड़ी अजीब चीज होती है कभी हँसाती है तो कभी रुलाती है।
क्योंकि "शायद" को लेकर इंसान अपने में नहीं रहता। इसी बात को खुद से जोड़कर कि यदि ऐसा होता तो "शायद" यदि वैसा होता । अपनी पूरी ज़िन्दगी बिताता है, उसके दिमाग पर "शायद" की परत चढ़ जाती है और वो कुछ भी निश्चित करने में सक्षम नहीं हो पाता ।
हर घटना "शायद" की भेंट चढ़ी होती है। हर परिवर्तन को "शायद" से जोड़ दिया जाता है।
यहाँ तक परम सत्य मृत्यु भी "शायद" की एक गाँठ अपने पीछे छोड़ जाती है।
फिरभी यही वो "शायद" होता है जो जीने की वजह भी देता है...... एक उम्मीद देता है..........
ज़िन्दगी में कोई दौर तो ऐसा आता होगा
जब खुद के लिये तु खुद को माँगता होगा
जब खुद के लिये तु खुद को माँगता होगा
©अनामिका चक्रवर्ती अनु



