Thursday, February 1, 2018


स्त्री

मैं स्त्री हूँ,
इसलिए सजग हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए सहज हूँ।

मैं स्त्री हूँ,
इसलिए धैर्य हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए तृष्णा हूँ।

मैं स्त्री हूँ,
इसलिए प्रकृति हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए गर्भ हूँ।

मैं स्त्री हूँ,
इसलिए छाया हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए माया हूँ।


मैं स्त्री हूँ ,
इसलिए अम्बर हूँ
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए धरा हूँ 

मैं स्त्री हूँ,
इसलिए सुंदर हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए शक्ति हूँ।

मैं एक स्त्री हूँ,
इसलिए तुम पुरुष हो।
तुम एक पुरुष हो,
इसलिए मैं स्त्री हूँ।
तुम और मै
हम हैं।
इसलिये जीवन है।



©अनामिका चक्रवर्ती अनु
मृत्यु
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नहीं होती मृत्यु अकस्मात्
न होती मिथ्या
न कोई भ्रम होता है
जीवन में कभी कभी
इ्च्छा में शामिल भी होती है


मृत्यु अपूर्ण नहीं होती
न होती कोई जिद है
न इसका कोई अंत होता है न शुरूआत
न ये प्रतिद्वंदी है
न प्रतिस्पर्धा करती है
इसकी जीत तय है
इस पर कोई तर्क-वितर्क नहीं हो सकता
इसे किसी उम्र ,बंधन और संबंध से
कोई मोह नहीं होता

ये न जाने जात-पात, ऊँच-नीच

बड़ी निष्ठा और आत्मविश्वास के साथ
ले जाती है हमें अपनें तय समय में
क्योंकी जानती है वह
संपूर्ण संसार में चाहे हम
सबका साथ छोड़ दें
मृत्यु का साथ कभी नहीं छोड़ते
एक बार जो साथ जाते है,
तो बस चलें ही जाते है
फिर कभी न लौटनें के लिये।


मृत्यु हत्या नहीं, दुर्घटना नहीं,
आत्महत्या नहीं और कोई आपदा भी नहीं।
मृत्यु मध्य रात्री या भोर के अंतिम क्षण का
कोई स्वप्न भी नहीं।
एक सर्व सत्य है।
मृत्यु तय होती है
मृत्यु अकस्मात् नहीं होती।



©अनामिका चक्रवर्ती अनु
प्रेम की गाँठों से 

तुमने महीन धागा बनाकर मुझे
अपने ग़मो की तुरपाई कर ली
और हर तुरपाई के आखिर में
बाँध दी प्रेम की गाँठ
ताकि न कभी मैं उधढ़ूँ
न कभी तुम्हारे घाव खुलें
फिर भी चटक ही जाता है 
कोई दर्द कभी कभी
जब स्मृतियों पर बादल गहरे हो जाते हैं
आता तो है दिल में कि
सिरे से धागे को निकाल दो 
मगर लगी हुई प्रेम की गाँठों से 
घाव के गहरे होकर
दर्द के बढ़ जाने का भय भी बढ़ जाता है
तुम्हारे इस भय से
बढ़ जाता है मेरा भी भय
क्योंकि महीन धागों पर लगी गाँठें
कभी खुलती नहीं
टूटकर समाप्त हो जाता है
उनका अस्तित्व भी।

©अनामिका चक्रवर्ती अनु

30/12/15

Wednesday, January 31, 2018



जिन्दगी की टूटी ख़्वाहिशो से 
गुजरती हुई रातें
इतनी बारीक होती हैं

के बिना पलकें भिगोएं समेटी नहीं जाती

अंधेरा सर्द बनकर
इस कदर दिल में उतरता है
के पलकें दिल के बोझ से
सुबह फिर उठाई नहीं जाती

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अनामिका चक्रवर्ती अनु



आमंत्रण
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कोई आमंत्रण तो नहीं दिया था
फिर क्यों आये तुम जीवन में
बीज प्रेम का ,
क्यों बोया मेरे मन में

स्वीकृति दी जब स्वयं को
तुम में घुल जाने

मूक हुए क्यों
तब तुम छल में

न पूर्ण आते हो
न पूर्ण जाते हो
क्यों विश्वास को
व्यथा पर प्रश्न बनाते हो

मंथन ये कैसा किया प्रेम का
बनाकर अमृत मुझको,
विष क्यों दिया जीवन में



© अनामिका चक्रवर्ती अनु 

मैं तुम्हारे होने को महसूस करती रही
तुम थे या नहीं, हो या नहीं
प्रश्न करती रही ।

विरान बंजर खंडहर ,
सदियों से कोई बसा नहीं जिसमें ,
गूँजी न हो कोई आवाज ।

या ऐसी कोई सड़क
लंबी दूरी तक जाते हुये कहीं
इस तरह थम गई,
जैसे उसके आगे कोई दुनियाँ ही नहीं है।

एक जला सा पन्ना,
जिसमें कुछ अक्षर नजर तो आये
पर कुछ कह नहीं पाये

जैसे वो खुद न जले ,
जली हो सिर्फ उनकी जुबान
मैं तुम्हारे होने को महसूस करती रही।

नदी किनारे सोई रेत की एक नदी ,
चट्टानों को निहारती हुई,
अपने सीने पर कदमों के चिन्ह संभालती हुई
मैं तुम्हें महसूस करती रही
तुम थे या नहीं ।

©अनामिका चक्रवर्ती अनु

Tuesday, January 30, 2018

_शायद--- डायरी के सुस्ताते पन्नों से ........
कभी कभी ज़िन्दगी निभाने के लिये ज़िन्दगी कम पड़ने लगती है और समय रेत की तरह हाथ से फिसल जाता है ,
और हम आधे अधुरे से दुनियाँ से चले जाते है और अपने पीछे छोड़ जाते है "शायद"
सच ये "शायद" भी बड़ी अजीब चीज होती है कभी हँसाती है तो कभी रुलाती है।
क्योंकि "शायद" को लेकर इंसान अपने में नहीं रहता। इसी बात को खुद से जोड़कर कि यदि ऐसा होता तो "शायद" यदि वैसा होता । अपनी पूरी ज़िन्दगी बिताता है, उसके दिमाग पर "शायद" की परत चढ़ जाती है और वो कुछ भी निश्चित करने में सक्षम नहीं हो पाता ।
हर घटना "शायद" की भेंट चढ़ी होती है। हर परिवर्तन को "शायद" से जोड़ दिया जाता है।
यहाँ तक परम सत्य मृत्यु भी "शायद" की एक गाँठ अपने पीछे छोड़ जाती है।
फिरभी यही वो "शायद" होता है जो जीने की वजह भी देता है...... एक उम्मीद देता है..........
ज़िन्दगी में कोई दौर तो ऐसा आता होगा
जब खुद के लिये तु खुद को माँगता होगा
©अनामिका चक्रवर्ती अनु