Saturday, February 3, 2018






मन यदि सागर हो
प्रेम नदी हो जाना चाहता है
सागर के सीने पर सर रखकर

मन प्राण से डूब जाना चाहती है
अनामिका चक्रवर्ती 


महानगर 

साँकल होती है शहर के दरवाजों पर
घरों में कुण्डियाँ नहीं लगी होती हैं
हर कस्बा शहर जाकर बूढ़ा हो जाता है,
जवानी पगडंडियों पर छूट जाती है।

मिट्टी के आँगन पर पड़ी दरारें
नहीं भरी जा सकती कंक्रीट से
और जहाँ भर दी जाती हैं,
वहाँ दरारें रिश्तों में पड़ी होती हैं।

नजर आता है आसमाँ गलियों सा,
जमीं पर गलियाँ,
अनाथों सी लगती है
रौनकें तो सिर्फ रातों को होती हैं यहाँ
स्ट्रीट लाईटों और गाड़ियों की हेडलईटों से।

दिन के उजाले डरते है जहाँ
खिड़कियों के अन्दर झाँकने से,
वहाँ न जाने कैसे दिन
और कैसी रातें होती हैं।




अनामिका चक्रवर्ती अनु 
 गलतियाँ

गलतियाँ मक्खी की तरह
भिनभिनाती हैं आसपास ही।
और चींटियों की तरह
कानो में अपनी पैंठ बना लेती हैं।

एक झनझनाहट के साथ
ऊँगुलियाँ कानो में जाकर कुछ टटोलती हैं
और उसके पोरो में चिपक जाती है
गलतियों की चिपचिपाहट।

बहुत झटकने के बाद भी,
नहीं छूटती, नहीं जाती ये
यहीं से शुरू होती है
गलतियों के बदबू फैलने का डर।

मगर उसकी सड़ांध को रोक पाना,
किसी झूठी सफाई के वश की भी बात नहीं रह जाती।
झूठ के सिलसिले पेंच बनकर उलझ जाए
ज़िन्दगी में।
बेहतर हो कि मान लिया जाये,
स्वीकार कर लिया जाये अपनी गलतियों को।



अनामिका चक्रवर्ती अनु
चैट करती हुई लड़की


 चैट करती हुई लड़की को
रात बहुत प्यारी सी लगती है

जैसे खिड़की के अधखुले पट से
      रातरानी की भीनी महक आती सी लगती है।
नर्म रेशमी चंचल सी हवा
      बालों को छूकर गुजरती सी लगती है ।

चैट करती हुई लड़की को
रात अल्हड़ सी लगती है।

टीन की छत पर बारिश की बूँदे
          दिल से शरारत करती सी लगती है
गीली मिट्टी की सौंधी खुशबू
           दिल में उतरती सी लगती है।

चैट करती हुई लड़की को
रात अनोखी सी लगती है।

खुद से मिलने की एक
          ह़सीन वज़ह
सी लगती है
की-पैड की रोशनी में मुस्कुराहट
               चाँदनी चमकीली सी लगती है

चैट करती हुई लड़की को
रात सुहानी लगती है

आँखों में मचलते ख़्वाब
            मनी प्लान्ट की बेल से लगते हैं
दूर से आती झींगुर की आवाजें
         कान्हा की बासुँरी की तान सी लगती है

चैट करती हुई लड़की को
रात बड़ी जादुई सी लगती है

रात के दरिया में ख़शी से भीगी भीगी
चैट करती हुई लड़की को
अल सुबह की नींद मखमली सी लगती है।


अनामिका चक्रवर्ती अनु

Thursday, February 1, 2018


स्त्री

मैं स्त्री हूँ,
इसलिए सजग हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए सहज हूँ।

मैं स्त्री हूँ,
इसलिए धैर्य हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए तृष्णा हूँ।

मैं स्त्री हूँ,
इसलिए प्रकृति हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए गर्भ हूँ।

मैं स्त्री हूँ,
इसलिए छाया हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए माया हूँ।


मैं स्त्री हूँ ,
इसलिए अम्बर हूँ
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए धरा हूँ 

मैं स्त्री हूँ,
इसलिए सुंदर हूँ।
मैं स्त्री हूँ,
इसलिए शक्ति हूँ।

मैं एक स्त्री हूँ,
इसलिए तुम पुरुष हो।
तुम एक पुरुष हो,
इसलिए मैं स्त्री हूँ।
तुम और मै
हम हैं।
इसलिये जीवन है।



©अनामिका चक्रवर्ती अनु
मृत्यु
~~~~
नहीं होती मृत्यु अकस्मात्
न होती मिथ्या
न कोई भ्रम होता है
जीवन में कभी कभी
इ्च्छा में शामिल भी होती है


मृत्यु अपूर्ण नहीं होती
न होती कोई जिद है
न इसका कोई अंत होता है न शुरूआत
न ये प्रतिद्वंदी है
न प्रतिस्पर्धा करती है
इसकी जीत तय है
इस पर कोई तर्क-वितर्क नहीं हो सकता
इसे किसी उम्र ,बंधन और संबंध से
कोई मोह नहीं होता

ये न जाने जात-पात, ऊँच-नीच

बड़ी निष्ठा और आत्मविश्वास के साथ
ले जाती है हमें अपनें तय समय में
क्योंकी जानती है वह
संपूर्ण संसार में चाहे हम
सबका साथ छोड़ दें
मृत्यु का साथ कभी नहीं छोड़ते
एक बार जो साथ जाते है,
तो बस चलें ही जाते है
फिर कभी न लौटनें के लिये।


मृत्यु हत्या नहीं, दुर्घटना नहीं,
आत्महत्या नहीं और कोई आपदा भी नहीं।
मृत्यु मध्य रात्री या भोर के अंतिम क्षण का
कोई स्वप्न भी नहीं।
एक सर्व सत्य है।
मृत्यु तय होती है
मृत्यु अकस्मात् नहीं होती।



©अनामिका चक्रवर्ती अनु
प्रेम की गाँठों से 

तुमने महीन धागा बनाकर मुझे
अपने ग़मो की तुरपाई कर ली
और हर तुरपाई के आखिर में
बाँध दी प्रेम की गाँठ
ताकि न कभी मैं उधढ़ूँ
न कभी तुम्हारे घाव खुलें
फिर भी चटक ही जाता है 
कोई दर्द कभी कभी
जब स्मृतियों पर बादल गहरे हो जाते हैं
आता तो है दिल में कि
सिरे से धागे को निकाल दो 
मगर लगी हुई प्रेम की गाँठों से 
घाव के गहरे होकर
दर्द के बढ़ जाने का भय भी बढ़ जाता है
तुम्हारे इस भय से
बढ़ जाता है मेरा भी भय
क्योंकि महीन धागों पर लगी गाँठें
कभी खुलती नहीं
टूटकर समाप्त हो जाता है
उनका अस्तित्व भी।

©अनामिका चक्रवर्ती अनु

30/12/15