Saturday, February 10, 2018

प्रतीक्षा की पीड़ा 

तुम्हारी प्रतीक्षा की पीड़ा 
प्रत्येक पहर में अलग सी होती है

कभी हँसी में दबी होती है

कभी रोजमर्रे के कामों में उलझी रहती है

कभी रिश्तों और जिम्मेदारियों में सहमी होती है
कभी जीवन की आपा धापी में चुप सी रहती है

कभी शहर की भागती सड़कों सी भीड़ होती है
कभी गाँव की पगडंडियों सी सूनी रहती है

कभी डूबती हुई शाम में उदास होती है
कभी भोर की ओस में भीगी सी रहती है

कभी चाँद बनकर बादलों में छुपी होती है
कभी गीली पलकों में नींद बनकर जागी रहती है

कभी खुद के होने का भरम होती है
कभी किस्मत का यकीन बनकर रहती है

मगर उसका रंग हर बार एक सा होता है
वो वक़्त की घड़ी में हरी होती है
और रगो में नीली बनकर बहती है।


अनामिका चक्रवर्ती अनु
तुम

यूँ ही किसी बात पर हँसते हँसते
मेरा हाथ पकड़कर
अक्सर टिक जाती हो जब तुम मेरे कंधे पर
तुम्हारी हँसी से झरते हुए फूलों को 
चुन लेना चाहता हूँ अपनी पलकों से
देना चाहता हूँ उन्हें एक सपना
तुम्हारे 'तुम' कहने पर 
स्पर्श करना चाहता हूँ उन शब्दों को 
जिसे मेरे लिये करती हो पूरा 'तुम' के संबोधन से
मैं शाम को डूबा हुआ देखता हूँ उदासी के 
ग्रे कलर में 
जब साथ मेरे होकर तुम कहीं और होती हो
तुम ढूँढती हो एक टूटते तारे को
जिसमें तुम्हारे सपनों का सच होना लिखा हो शायद
मगर उसी टूटते तारे से माँग लेना चाहता हूँ
तुम्हें मैं 
तुम्हारे हँसते हुए लम्हों को हर पल तुम्हें देने के एक वादे के साथ


© अनामिका_चक्रवर्ती अनु

अभी सिर्फ अंश ----
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हमेंशा लगता है मैं इस जगह सदियाँ गुजार सकती हूँ क्योंकि शायद यही वो जगह है जहाँ मैं खुद से जी भर कर बातें कर सकती हूँ। खुद से मिल सकती हूँ।
सड़क पर चल रही मादक रौशनी में डूबी अनगिनत गाड़ियों और आसमान पर बिखरे अनगिनत रौशनी में भीगे तारो के बीच पच्चीसवें माले की इस खिड़की के सामनें
 एक शून्य मेरी तरह ही अंधेरे में डूबा हुआ है। वो भी खुद से यहीं मिलता है बातें करता है।
बहुत कुछ ऐसा होता है जो सिर्फ शून्य में ही हो सकता है। पर सांसे दोनो की चुप है तभी तो इतनी गहरी खामोशी छायी हुयी है।
और इस वक्त अगर सांसे कहीं चल रही है तो वो इस काॅफी मग से उठते हुये धुएँ में , वो भी जाने कब रुक जाएगी।
कितनी अजीब बात है आज से सात साल पहले जिसके लिए कितने लोग पागल थे और मैं भी पागाल थी और आज भी हो रही हूँ उसी के लिए मगर सिर्फ मैं अकेली ...
ये पागलपन भी कमाल का होता है ...
दीवाने थे जिस खुशबु के सब
उस परफ़्युम से अब मेरा दम घुटनें लगा है उसी से जैसे मेरे होठ मेरी जीभ मेरी हर सांस बदबुदार होते जा रहे है । भले ही उन आँखों में गजब का नशा है पर उसमें से अब प्यार की नहीं वासना की मारक्त गंध आने लगी है। नशा अब नोंचता है खून को पानी कर देता है ....
किसी से अलग रहकर ना जीने का डर साथ रहनें को कितना मुश्किल कर देता है कि खुद का जिस्म ही खुद में बोझ सा लगनें लगता है।

ओह ! काॅफी भी ठंडी हो गयी और मग भी मन का क्या कहूँ .....
सड़क पर मादक रौशनी अब भी रफ़्तार से दौडती गाड़ियों को चूम रही है ......


©अनामिका चक्रवर्ती अनु
20/2/2015

Saturday, February 3, 2018






मन यदि सागर हो
प्रेम नदी हो जाना चाहता है
सागर के सीने पर सर रखकर

मन प्राण से डूब जाना चाहती है
अनामिका चक्रवर्ती 


महानगर 

साँकल होती है शहर के दरवाजों पर
घरों में कुण्डियाँ नहीं लगी होती हैं
हर कस्बा शहर जाकर बूढ़ा हो जाता है,
जवानी पगडंडियों पर छूट जाती है।

मिट्टी के आँगन पर पड़ी दरारें
नहीं भरी जा सकती कंक्रीट से
और जहाँ भर दी जाती हैं,
वहाँ दरारें रिश्तों में पड़ी होती हैं।

नजर आता है आसमाँ गलियों सा,
जमीं पर गलियाँ,
अनाथों सी लगती है
रौनकें तो सिर्फ रातों को होती हैं यहाँ
स्ट्रीट लाईटों और गाड़ियों की हेडलईटों से।

दिन के उजाले डरते है जहाँ
खिड़कियों के अन्दर झाँकने से,
वहाँ न जाने कैसे दिन
और कैसी रातें होती हैं।




अनामिका चक्रवर्ती अनु 
 गलतियाँ

गलतियाँ मक्खी की तरह
भिनभिनाती हैं आसपास ही।
और चींटियों की तरह
कानो में अपनी पैंठ बना लेती हैं।

एक झनझनाहट के साथ
ऊँगुलियाँ कानो में जाकर कुछ टटोलती हैं
और उसके पोरो में चिपक जाती है
गलतियों की चिपचिपाहट।

बहुत झटकने के बाद भी,
नहीं छूटती, नहीं जाती ये
यहीं से शुरू होती है
गलतियों के बदबू फैलने का डर।

मगर उसकी सड़ांध को रोक पाना,
किसी झूठी सफाई के वश की भी बात नहीं रह जाती।
झूठ के सिलसिले पेंच बनकर उलझ जाए
ज़िन्दगी में।
बेहतर हो कि मान लिया जाये,
स्वीकार कर लिया जाये अपनी गलतियों को।



अनामिका चक्रवर्ती अनु
चैट करती हुई लड़की


 चैट करती हुई लड़की को
रात बहुत प्यारी सी लगती है

जैसे खिड़की के अधखुले पट से
      रातरानी की भीनी महक आती सी लगती है।
नर्म रेशमी चंचल सी हवा
      बालों को छूकर गुजरती सी लगती है ।

चैट करती हुई लड़की को
रात अल्हड़ सी लगती है।

टीन की छत पर बारिश की बूँदे
          दिल से शरारत करती सी लगती है
गीली मिट्टी की सौंधी खुशबू
           दिल में उतरती सी लगती है।

चैट करती हुई लड़की को
रात अनोखी सी लगती है।

खुद से मिलने की एक
          ह़सीन वज़ह
सी लगती है
की-पैड की रोशनी में मुस्कुराहट
               चाँदनी चमकीली सी लगती है

चैट करती हुई लड़की को
रात सुहानी लगती है

आँखों में मचलते ख़्वाब
            मनी प्लान्ट की बेल से लगते हैं
दूर से आती झींगुर की आवाजें
         कान्हा की बासुँरी की तान सी लगती है

चैट करती हुई लड़की को
रात बड़ी जादुई सी लगती है

रात के दरिया में ख़शी से भीगी भीगी
चैट करती हुई लड़की को
अल सुबह की नींद मखमली सी लगती है।


अनामिका चक्रवर्ती अनु