Sunday, March 25, 2018


 तरल हो जाना

सरलता से तरल हो जाना
सहजता को परिभाषित नहीं करता
उसी अपरिभाषित सहजता के साथ
तरल हो जाना चाहती हूँ

पात्र के अनुरूप ही
उनके किनारों में बिना कोई दाग बने
बिना उनके किनारों से छलके
आकार हो जाना चाहती हूँ

नहीं जाना चाहती तरलता के
उस सत्य से बाहर
जहाँ तृप्त होने की तृष्णा को
मरिचिका का आभास हो

रहना चाहती हूँ
उसी सत्य के अदृश्य तह में ही
जहाँ तृष्णा को भी
तृप्त होने का पूर्ण विश्वास हो

Monday, February 12, 2018

शापमुक्त


देह से निकली देह,  तुम मात्र देह नहीं हो
तुम्हें देह से स्त्री बनना होगा
तुम्हें वास्ता है उन तमाम स्त्रियों का
जो देह को स्त्री न बना सकी

और स्त्री होने की अतृप्त अभिलाषा मन में लिये
जीवन को अभिशाप की तरह भोगा है
जीवन के आनंद से हमेंशा वंचित रही

 स्त्री बनकर उन्हें शाप मुक्त करना होगा
उनकी आत्मा को मोक्ष दिलाना होगा
तुम्हारा स्त्री होना ही उनका स्त्री होना होगा

क्योंकि स्त्री माने ही सर्वशक्ति है सर्वधर्म है
स्त्री होना ॠणी होना नहीं है प्रकृति होना है
सम्मान और गर्व का प्रतिरूप ही स्त्री है।

स्त्री को देह से मुक्त कर स्त्री हो जाओ
पुरुष प्रधानता की दास या प्रतिदव्ंदी होकर नहीं
परस्पर होनें की प्रतिष्ठा होने को स्त्री होनें दो
देह से मुक्त स्त्री ही स्त्री जीवन का सत्य है।



अनामिका चक्रवर्ती अनु
नन्हीं गौरैया

जब चहचहाती हो तुम
मेरे घर आँगन में,
लगती हो जैसे

नन्हीं बेटी के पैरो में
छुनछुन करती पायल सी


चुगती हो जब तुम 

मेरे घर के अन्न का
मुट्ठी भर दाना 
खुश होती तब अन्नपूर्णा सी

तुम प्यारी गौरैया
मेरे बच्चों सी चिरैया
रोज मिलती हो तुम
पहली धूप बनकर


लगती हो तुम 
नन्हीं हथेलियों सी
और कभी लगती हो
अबोध मुस्कान सी



अनामिका चक्रवर्ती अनु 

Saturday, February 10, 2018

आँखों की भूख 

पेट की भूख 
जब आँखों में उतरने लगती है
तुम्हारे काँटे में फँसी 
मरी हुई मछलियाँ

तुम वापस पानी में छोड़कर,
ढूंढते हो
जिंदा मछलियाँ

उन्हें फिर मारकर खाने के लिए
भूख की आग में सेंक कर
अपने लोभ को पूरा करने के लिए

तुम्हारा यही स्वाभाव समाज में घुल गया
फिर तुम ढूंढने लगे
बार बार उन्हें शिकार बनाने को
कई बार

जिंदा मछलियों को फिर नये ढंग से
कांटे में फाँसने के लिए
भून कर खाने के लिए

तब भुनी हुई मछलियों से नहीं
तुम्हारे दोहरे चरित्र से बू आने लगी




©अनामिका चक्रवर्ती अनु



'आसमानी 
----------------

चखना चाहती हूँ 
नीले आसमां को 

क्या वो भी होता होगा
समंदर की तरह खारा।

लहरे कभी मचलती होगी वहाँ भी
चाँद के तट पर बैठकर,
छूना चाहती हूँ लहरों को।

कोई संगीत तो वहाँ भी 
जरूर गुनगुनाता होगा।
नर्म रेत पर कोई ,
अपनें प्रेयस का नाम लिखता होगा।

अपनी उदासियों को सौंपता होगा
जाती हुई लहरों को।
जो छुप जाती है होगी चाँद के पीछे कहीं।

यादों को लपेटकर चाँदनी में ,
सीप का मोती बनाता होगा कोई।

खुद ही डूब जाऊँ
समंदर को बाहों में समेटकर 
नीले आसमां में कहीं।
या चखकर बन जाऊँ आसमानी।

हाँ ,एक बार चखना चाहती हूँ
नीले आसमां को ।

©अनामिका चक्रवर्ती 'अनु'
9/1/2015'

आसमानी 

चखना चाहती हूँ
नीले आसमां को

क्या वो भी होता होगा
समंदर की तरह खारा।

लहरे कभी मचलती होगी वहाँ भी
चाँद के तट पर बैठकर,
छूना चाहती हूँ लहरों को।

कोई संगीत तो वहाँ भी
जरूर गुनगुनाता होगा।
नर्म रेत पर कोई ,
अपनें प्रेयस का नाम लिखता होगा।

अपनी उदासियों को सौंपता होगा
जाती हुई लहरों को।
जो छुप जाती है होगी चाँद के पीछे कहीं।

यादों को लपेटकर चाँदनी में ,
सीप का मोती बनाता होगा कोई।

खुद ही डूब जाऊँ
समंदर को बाहों में समेटकर
नीले आसमां में कहीं।
या चखकर बन जाऊँ आसमानी।

हाँ ,एक बार चखना चाहती हूँ
नीले आसमां को ।


©अनामिका चक्रवर्ती अनु

9/1/2015
प्रतीक्षा की पीड़ा 

तुम्हारी प्रतीक्षा की पीड़ा 
प्रत्येक पहर में अलग सी होती है

कभी हँसी में दबी होती है

कभी रोजमर्रे के कामों में उलझी रहती है

कभी रिश्तों और जिम्मेदारियों में सहमी होती है
कभी जीवन की आपा धापी में चुप सी रहती है

कभी शहर की भागती सड़कों सी भीड़ होती है
कभी गाँव की पगडंडियों सी सूनी रहती है

कभी डूबती हुई शाम में उदास होती है
कभी भोर की ओस में भीगी सी रहती है

कभी चाँद बनकर बादलों में छुपी होती है
कभी गीली पलकों में नींद बनकर जागी रहती है

कभी खुद के होने का भरम होती है
कभी किस्मत का यकीन बनकर रहती है

मगर उसका रंग हर बार एक सा होता है
वो वक़्त की घड़ी में हरी होती है
और रगो में नीली बनकर बहती है।


अनामिका चक्रवर्ती अनु