Sunday, April 28, 2019

उम्र के एक हिस्से में
दियासलाई रखी हुई थी
किसी रंगीन कपड़े में
लिपटी हुई जिदगी की तरह

आग किसी बारूद की शक्ल में
अपनी ही मादक गंध के
आकर्षण में डूबी थी
जो कपड़े की हर एक
सलवट में समाई थी

जलकर राख में ही
तब्दील हो जाना तय था
मगर जलने से पहले तपना था
किसी खरे सोने की तरह
ऐसा तपना मानों उम्र के हिस्से में रखी
दियासलाई की हर एक तिली
किसी उम्र की तरह जली हो
और रंग चटका हो इस तरह
जैसे डूबते हुए सूरज ने अपने
पंख फैला दिए हों आसमां के
आखिरी तारीख पर जाकर।


#अनामिका_चक्रवर्तीअनु



Tuesday, October 2, 2018

   तुम्हारी बातें

जब बार बार एक व्यवहार पलट पलट कर आता है प्रेम के अच्छे व्यवहार के अंतराल में तो प्रेम कहीं ओझल हो जाता है।
ऐसा लगता है जैसे प्रेम कहीं है ही नहीं, था ही नहीं जो जी रहे थे अब तक प्रेम समझकर वो कुछ और ही था परन्तु क्या ? ये समझ नहीं आता कि क्या था हमारे बीच ।

अजीब कशमकश है अचानक से आया परायापन प्रेम को जैसे छीन लेता है।
 यही है तो इस रिश्ते की सच्चाई क्या है वो कौन सी डोर है जो बाँधे हुए है। कौन सी तलब है जो मिटती नहीं बल्कि बढ़ती जाती है।

ऐसा क्यों लगता है जैसे सबकुछ एकतरफा है। प्रेम का क्या अर्थ है तुम्हारे लिए केवल मर्जी इसमें तुम्हारी भावनाएँ मतलबी सी क्यों है और फिर जीवन भर साथ चलने की बात भी है
एक साथ दो विपरीत बातें कैसे हो सकती हैं ।
वो कौन सा हिस्सा है जो मेरी आँखे नहीं देख पा रही है मेरा मन नहीं समझ पा रहा है।
मैं खुद को कब तक तसल्ली देती रहूँ अपने ही सवालों के खुद ही जवाब देकर आखिर इस घेरे से तुम मुझे क्यों नहीं निकालते मुझे ही खुद को दिलासा देकर क्यों निकलना पड़ता है ।
कहो .....

Sunday, March 25, 2018


तरल हो जाना

सरलता से तरल हो जाना
सहजता को परिभाषित नहीं करता
उसी अपरिभाषित सहजता के साथ
तरल हो जाना चाहती हूँ

पात्र के अनुरूप ही
उनके किनारों में बिना कोई दाग बने
बिना उनके किनारों से छलके
आकार हो जाना चाहती हूँ

नहीं जाना चाहती तरलता के
उस सत्य से बाहर
जहाँ तृप्त होने की तृष्णा को
मरिचिका का आभास हो

रहना चाहती हूँ
उसी सत्य के अदृश्य तह में ही
जहाँ तृष्णा को भी
तृप्त होने का पूर्ण विश्वास हो


अनामिका चक्रवर्ती अनु

 तरल हो जाना

सरलता से तरल हो जाना
सहजता को परिभाषित नहीं करता
उसी अपरिभाषित सहजता के साथ
तरल हो जाना चाहती हूँ

पात्र के अनुरूप ही
उनके किनारों में बिना कोई दाग बने
बिना उनके किनारों से छलके
आकार हो जाना चाहती हूँ

नहीं जाना चाहती तरलता के
उस सत्य से बाहर
जहाँ तृप्त होने की तृष्णा को
मरिचिका का आभास हो

रहना चाहती हूँ
उसी सत्य के अदृश्य तह में ही
जहाँ तृष्णा को भी
तृप्त होने का पूर्ण विश्वास हो

Monday, February 12, 2018

शापमुक्त


देह से निकली देह,  तुम मात्र देह नहीं हो
तुम्हें देह से स्त्री बनना होगा
तुम्हें वास्ता है उन तमाम स्त्रियों का
जो देह को स्त्री न बना सकी

और स्त्री होने की अतृप्त अभिलाषा मन में लिये
जीवन को अभिशाप की तरह भोगा है
जीवन के आनंद से हमेंशा वंचित रही

 स्त्री बनकर उन्हें शाप मुक्त करना होगा
उनकी आत्मा को मोक्ष दिलाना होगा
तुम्हारा स्त्री होना ही उनका स्त्री होना होगा

क्योंकि स्त्री माने ही सर्वशक्ति है सर्वधर्म है
स्त्री होना ॠणी होना नहीं है प्रकृति होना है
सम्मान और गर्व का प्रतिरूप ही स्त्री है।

स्त्री को देह से मुक्त कर स्त्री हो जाओ
पुरुष प्रधानता की दास या प्रतिदव्ंदी होकर नहीं
परस्पर होनें की प्रतिष्ठा होने को स्त्री होनें दो
देह से मुक्त स्त्री ही स्त्री जीवन का सत्य है।



अनामिका चक्रवर्ती अनु
नन्हीं गौरैया

जब चहचहाती हो तुम
मेरे घर आँगन में,
लगती हो जैसे

नन्हीं बेटी के पैरो में
छुनछुन करती पायल सी


चुगती हो जब तुम 

मेरे घर के अन्न का
मुट्ठी भर दाना 
खुश होती तब अन्नपूर्णा सी

तुम प्यारी गौरैया
मेरे बच्चों सी चिरैया
रोज मिलती हो तुम
पहली धूप बनकर


लगती हो तुम 
नन्हीं हथेलियों सी
और कभी लगती हो
अबोध मुस्कान सी



अनामिका चक्रवर्ती अनु